
बस्तर दशहरा: काछन गादी की अनोखी परंपरा, 9 साल की पीहू बनी काछनदेवी, कांटों के झूलों में लेटकर दशहरा पर्व मनाने की दी अनुमति..
- बस्तर में अनोखी परंपरा कांटों के झूलों में लेटकर 9 साल की पीहू देती है बस्तर दशहरा पर्व मनाने की अनुमति
- बस्तर दशहरा 700 वर्षों से चली आ रही है जो 75 दिनों तक चलता है.
बस्तर:- अपनी अनूठी और आकर्षक परंपराओं के लिए पूरी दुनिया में पहचान रखने वाला बस्तर का महापर्व दशहरा रविवार रात से शुरू हो गया , इस महापर्व की शुरुआत हर साल उस विशेष रस्म से होती है जिसे काछन गादी कहा जाता है, ,जो करीब 700 साल से चली आ रही यह परंपरा आज भी पूरे आस्था और श्रद्धा के साथ निभाई जाती है, इस रस्म में अनुसूचित जाति के एक विशेष परिवार की नाबालिग कुंवारी कन्या कांटो से बने झूले पर लेटकर बस्तर राजपरिवार को दशहरा शुरू करने की अनुमति देती है, मान्यता है कि इस कन्या के भीतर स्वयं देवी आकर महापर्व को निर्बाध सम्पन्न कराने का आशीर्वाद देती हैं, इस वर्ष भी 9 साल की पीहू ने काछनदेवी का रूप धारण कर पर्व आरंभ करने की अनुमति दी, काछन गुड़ी परिसर में आयोजित इस परंपरा के साक्षी बनने के लिए बस्तर राजपरिवार, स्थानीय जनप्रतिनिधि और हजारों श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचे…
बस्तर राज परिवार सदस्य कमलचंद भंजदेव ने बताया कि हर साल नवरात्रि के एक दिन पहले पितृमोक्ष अमावस्या को रस्म निभाकर राज परिवार दशहरा मनाने की अनुमति प्राप्त करता है, इस दौरान बस्तर का राज परिवार और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ हजारो की संख्या में लोग अनूठी परंपरा को देखने काछनगुड़ी पहुंचते हैं. 75 दिनों तक मनाए जाने वाले बस्तर दशहरा पर्व में 12 से ज्यादा निभाई जानेवाली रस्में अद्भुत और अनोखी होती हैं… जिसे देखने केवल देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी बड़ी संख्या में सैलानी बस्तर दशहरा के दौरान जगदलपुर पहुंचते हैं.



