
Navratri Special: सरई के विशाल वृक्ष से सजी माता का दरबार, यहां मां सरई श्रृंगार के रूप में विराजमान है, मान्यता है कि कटे हुए पेड़ फिर से जुड़ गए थे ….
- जांजगीर चांपा जिले के बलौदा अंतर्गत डोंगरी ग्राम में जंगल के कटे सरई वृक्ष अपने आप जुड़ गया जिसके कारण यहां माता सरई श्रृंगार नाम से प्रसिद्ध है, यहां माता करती है जंगल की रक्षा..
जांजगीर चांपा :- नवरात्रि पर्व में देशभर माता के विभिन्न रूपों का आस्था और विश्वास के साथ मातारानी की पूजा की जा रही.और श्रद्धालु देवी मंदिर मे अपनी मनोकामना लेकर पहुंच रहे है. वही इस नवरात्रि में आज हम आपको एक ऐसा देवी मंदिर के बारे में बता रहे है जहां माता का श्रृंगार पेड़ो पौधो ने की है. और इस पेड़ो की रक्षा स्वयं माता रानी करती है इसी कारण यहां माता का नाम सरई एक वृक्ष के नाम से जाना जाता है. और लोग मां को सरई श्रृंगार के रूप मे जाने जाते है. जांजगीर चांपा जिले के बलौदा अंतर्गत डोंगरी ग्राम में जंगल के कटे हुए सरई के वृक्ष अपने आप जुड़ गया जिसके कारण यहां माता सरई श्रृंगार नाम से प्रसिद्ध है, यहां जंगल की रक्षा माता करती है.
जांजगीर चांपा जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर बलौदा से लगे हुए ग्राम डोंगरी है जहां माँ सरई श्रृंगारिणी का मंदिर है. यहां सरई (साल) के वृक्ष के साथ अन्य कई प्रकार के चारो ओर विशाल काय वृक्षो से है जिससे माता रानी का दरबार सजी हुई है यहां श्रद्धालुओं को शीतलता और शांति प्रदान करती है. माता रानी के प्रति श्रद्धालुओं का अनूठा विश्वास है. यहां चैत्र और क्वार नवरात्रि मे श्रद्धालु मनोकामना ज्योति कलश प्रज्ज्वलित कराते है.
जानिए यहां की क्या हैं मान्यता…
मंदिर के सेवक अनिल शुक्ला ने बताया की सरई श्रृंगार धाम में जो सरई के वृक्ष है उसका महत्व बताया की 400 साल पहले भिलाई गांव का साहू समाज के एक व्यक्ति जंगल मे लकड़ी काटने गया और सरई की पेड़ को काटकर रख दिया उसके बाद दूसरे दिन जब उस सरई पेड़ के लकड़ी को लेने जाने के लिए गाड़ा (बैलगाड़ी ) लेकर पंहुचा तो देखा कि कटी हुई लकड़ी वहा पर नहीं है. और जिस पेड़ को काटा था वहा पर फिर से जुड़ गया है. और लड़की के कटने के निशान भी नही देख रहा था. उस व्यक्ति ने फिर से उसे काटने का प्रयास किया तब माता ने उसे अपनी उपस्थिति और लकड़ी नहीं काटने के सम्बन्ध मे संकेत दिया. उसके बाद भी वह व्यक्ति लकड़ी काटना बंद नहीं कुछ समय बाद उस व्यक्ति की तबियत खराब होने लगी और उसकी मृत्यु हो गई. इसके बाद उस व्यक्ति का पूरा कुल ही उस भिलाई गाँव मे रहने लायक नहीं रहा.
इसके बाद आज तक भिलाई गांव में साहू समाज के व्यक्ति यहां नहीं रहते है. यहां पेड़ कटकर फिर से जुड़ने के पुष्टि वनस्पति विभाग के वैज्ञानिक ने की है. इस घटना के बाद आसपास के लोग वनदेवी की आराधना करने लगे और तब से पेड़ो की कटाई करने से डरते है. उसके बाद मंदिर के गर्भ गृह अखंड ज्योत जलाया गया. जो आज 35 साल से अधिक समय से यह अखंड ज्योत जल रहा है. मंदिर मे आने वाले श्रद्धालुओं के अनुसार माता रानी का प्रमाण वर्षो पहले मिला. और बताया की इस मंदिर के स्थान पर पहले झोपडीनुमा मंदिर था लेकिन भक्तो की श्रद्धा और विश्वास के कारण इस स्थान मे कई बड़े बड़े मंदिर का निर्माण हो चुका है. श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए मंदिर परिसर के पेड़ो मे लाल कपडे से नारियल बांधते है और मनोकामना पूरी होने पर ज्योति कलश प्रज्ज्वलित करते हैं. मंदिर की प्रसिद्धि इतनी है कि माता रानी के दर पर छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि मध्यप्रदेश महाराष्ट्र और ओड़िसा के श्रद्धालु मनोकामना ज्योति कलश की स्थापना कराते है



