
मदर्स डे विशेष : पिता का साया उठने के बाद मां ने संघर्षों से गढ़ी बेटे की सफलता की कहानी, खेत बेचकर मां ने सींचा भविष्य, बेटा सूबेदार बनकर लौटा तो गर्व से ऊंचा हुआ सिर…
खेत बेचकर मां ने सींचा भविष्य, बेटा सूबेदार बनकर लौटा तो गर्व से ऊंचा हुआ सिर
- मदर्स डे विशेष : पिता का साया उठने के बाद मां ने संघर्षों से गढ़ी बेटे की सफलता की कहानी,
- खेत बेचकर मां ने सींचा भविष्य, बेटा सूबेदार बनकर लौटा तो गर्व से ऊंचा हुआ सिर
जांजगीर : कहते हैं कि अगर इरादे मजबूत हों तो हालात भी रास्ता छोड़ देते हैं। सक्ती जिले के ग्राम धमनी की रहने वाली सुरती बाई ने यह सच कर दिखाया। पति के निधन के बाद छह बेटियों और एक छोटे बेटे की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। खुद अशिक्षित होने के बावजूद उन्होंने अपने इकलौते बेटे पुष्पेंद्रराज के सपनों को टूटने नहीं दिया। संघर्ष, त्याग और मेहनत की बदौलत आज वही बेटा छत्तीसगढ़ पुलिस में सूबेदार बनकर गांव लौटा तो पूरे गांव का सिर गर्व से ऊंचा हो गया। गांव की तंग गलियों से निकलकर पुलिस सेवा तक पहुंचने वाले पुष्पेंद्रराज की सफलता के पीछे उनकी मां की तपस्या छिपी है। जब पुष्पेंद्र पहली बार सूबेदार की वर्दी पहनकर गांव पहुंचे, तो ढोल-नगाड़ों और भारत माता की जय के नारों के बीच स्वागत हुआ। लेकिन सबसे ज्यादा चमक उस मां की आंखों में थी जिसने अपने बेटे के भविष्य के लिए सबकुछ दांव पर लगा दिया। मां के संघर्ष और बेटे की मेहनत रंग लाई। कठिन परिश्रम के बाद पुष्पेंद्रराज का चयन छत्तीसगढ़ पुलिस में सूबेदार पद पर हुआ। आज मदर्स डे पर सुरती बाई की कहानी सिर्फ एक मां के त्याग की मिसाल नहीं है, बल्कि यह उन तमाम महिलाओं के साहस की कहानी भी है जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने बच्चों के सपनों को टूटने नहीं देतीं।
पति के बाद परिवार की पूरी िजम्मेदारी संभाली सुरती बाई के पति छोटेलाल खटर्जी का निधन वर्ष 2000 में हो गया था। उस समय पुष्पेंद्र महज चार साल के थे। परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। घर चलाने से लेकर बच्चों की परवरिश तक की पूरी जिम्मेदारी सुरती बाई पर आ गई। आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। बंटवारे में मिली पुश्तैनी जमीन पर खेती कर उन्होंने परिवार संभालने की कोशिश की, लेकिन उससे गुजारा नहीं हो पा रहा था। हालात इतने कठिन थे कि कई बार दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाता था, लेकिन मां ने बेटी व बेटे की पढ़ाई कभी नहीं रुकने दी। पढ़ाई में किसी तरह की बाधा न आए, इसके लिए उन्होंने अपनी हिस्से की जमीन तक बेच दी।
बेटा अफसर बन गया, अब जिंदगी सफल लगती सुरती बाई कहती हैं कि पति के जाने के बाद जिंदगी पूरी तरह बदल गई थी। कई बार हालात ने तोड़ने की कोशिश की, लेकिन बेटे और बेटियों का चेहरा देखकर हिम्मत मिलती रही। पुष्पेंद्रराज ने बताया कि उनके संघर्ष को देखकर मां अक्सर परेशान हो जाया करती थीं। जब सूबेदार चयन प्रक्रिया में देरी हुई, तब पूरा परिवार मानसिक रूप से टूट गया था। उस दौरान मां की तबीयत भी खराब हुई, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। आज वह गर्व से कहती हैं कि जब बेटा सूबेदार बन गया है, तो लगता है कि उनका वर्षों का संघर्ष सफल हो गया।




