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विश्वप्रसिद्ध टाइटैनिक हादसे से जुड़ी जांजगीर की याद, मिस एनी फंक ने जगाई शिक्षा की अलख, त्याग और मानवता की बनी अमर मिसाल…
- टाइटैनिक हादसे से जुड़ी जांजगीर की याद, मिस एनी फंक ने जगाई शिक्षा की अलख, त्याग और मानवता की बनी अमर मिसाल…
जांजगीर चांपा:- 15 अप्रैल 1912 को घटित विश्व प्रसिद्ध टाइटैनिक हादसा की त्रासदी सिर्फ एक समुद्री हादसा नहीं थी, बल्कि कई अनसुनी कहानियों को अपने साथ समेटे हुए है, इन्हीं कहानियों में से एक है जांजगीर- चांपा से जुड़ी मिस एनी क्लेमर फंक की, जिन्होंने न सिर्फ इस क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगाई, बल्कि अपने जीवन के अंतिम क्षणों में अद्भुत त्याग और मानवता की मिसाल भी पेश की है.
अमेरिका के पेंसिल्वेनिया की रहने वाली एनी क्लेमर फंक दिसंबर 1906 में भारत आईं, वे पहली मेनोनाइट महिला मिशनरी थीं, जिनका उद्देश्य समाज में शिक्षा का प्रसार करना था, उस समय भारत, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में बालिका शिक्षा की स्थिति बेहद कमजोर थी, ऐसे दौर में उन्होंने जांजगीर-चांपा के भीमा तालाब के पास 1907 में एक किराए के मकान में मात्र 17-18 लड़कियों के साथ एक गर्ल्स स्कूल की शुरुआत की, यह क्षेत्र की पहली ऐसी पहल थी, जहां बेटियों को शिक्षा देने का कार्य शुरू हुआ, उन्होंने 1908 से 1912 तक निःस्वार्थ भाव से यहां अध्यापन किया और घर-घर जाकर लोगों को बेटियों को पढ़ाने के लिए प्रेरित किया.
फरवरी 1912 में उन्हें सूचना मिली कि उनकी मां सुसन्ना क्लेमर फंक गंभीर रूप से बीमार हैं, मां से मिलने की बेचैनी में वे जांजगीर नैला रेलवे स्टेशन से ट्रेन से मुंबई, फिर इंग्लैंड पहुंचीं, वहां कोयला मजदूरों की हड़ताल के कारण उनका निर्धारित जहाज रद्द हो गया, ऐसे में उन्होंने 13 पौंड अतिरिक्त किराया देकर टाइटैनिक के द्वितीय श्रेणी का टिकट (नंबर 237671) लिया और 10 अप्रैल 1912 को साउथम्प्टन से अमेरिका के लिए रवाना हो गईं.
जहाज पर ही मनाया अपना अंतिम जन्मदिन..
टाइटैनिक यात्रा के दौरान 12 अप्रैल 1912 को उन्होंने अपना 38वां जन्मदिन जहाज पर ही खुशी-खुशी मनाया, लेकिन यह उनका अंतिम जन्मदिन साबित हुआ,14-15 अप्रैल की दरमियानी रात टाइटैनिक एक विशाल हिमखंड से टकरा गया, जिससे जहाज में दरार आ गई और कुछ ही घंटों में वह अटलांटिक महासागर में डूब गया, इस भीषण हादसे में करीब 1517 लोगों की जान चली गई, जिनमें मिस फंक भी शामिल थीं.इसकी जानकारी टाइटैनिक हादसे में जान गवाने वाले यात्रियों के बारे में जारी किए गए दस्तावेजों से मिली.
जांजगीर के फंक मेमोरियल स्कूल के प्राचार्य सरोजनी सिंग ने बताया की 15 अप्रैल 1912 की अंधेरी रात में जब टाइटेनिक नार्थ अटलांटिक महासागर में डूब रहा था तब उसमें सवार लोगों को बचाने के लिए जहाज के कप्तान एवं कर्मचारी यात्रियों की सुरक्षा की पूर्ण कोशिश में लग गए एवं जहाज में उपलब्ध जीवन रक्षक नौकाओं को समुद्र में उतारा जाने लगा, किस्मत से मिस फंक को अंतिम लाइफ बोट में सीट मिल गई वह अपने सीट में बैठने ही वाली थी की लेकिन एक बच्चे को सीट नहीं मिली थी और उस बच्चें की मां को सीट मिल गई थी. मां और उसके बच्चे बिछड़ न जाए इसलिए मिस फंक ने अपना लाइफ बोट का सीट त्याग दिया और स्वयं डूबते हुए टाईटेनिक में रुक गई. मिस एनी क्लेमर फंक की इस त्याग और बलिदान ने एक मां को अपने बच्चों से जुदा होने से बचा लिया जांजगीर की इस टाईटेनिक यात्री का बलिदान जांजगीर एवं पूरे विश्व के लिए आदर्श एवं गौरव की बात है, जिसे कोई भूला न पायेगा. उनका यह त्याग आज भी मानवता की एक मिसाल के रूप में याद किया जाता है.

वही विनीत कुमार सालूमन ने बताया की उनकी स्मृति में जांजगीर में फंक मेमोरियल स्कूल की स्थापना की गई, जो आज भी उनके योगदान की याद दिलाता है, हालांकि पुराना हॉस्टल भवन अब जर्जर हो चुका है, लेकिन वहां मौजूद शिलालेख आज भी उनके कार्यों की गवाही देता है, हर वर्ष 15 अप्रैल को उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है, इसके साथ ही स्कूल के पास बने स्वागत द्वार को मिस एनी क्लेमर फंक मेमोरियल गेट नाम से बनाया जा रहा है, मिस एनी क्लेमर फंक का जीवन सिर्फ एक शिक्षिका या मिशनरी की कहानी नहीं, बल्कि सेवा, समर्पण और त्याग का अद्वितीय उदाहरण है, जिसने जांजगीर को इतिहास के पन्नों में एक खास पहचान दिलाई है.



